हिन्दी रिपोर्ट
आजकल हंगेरियन लोग भारत में दिलचस्पी लेते हैं। लेकिनजैसे ही भारतीयों के लिए युरोपमें कुछ भी बतानाकठिन है, यहाँ के लोगोंको भी भारत के बारे में बातचीत करनी बहुत मुश्किल है।
मैं इन साढ़ेमहीनों के बाद भी थोड़े-थोड़ेसमझ सकता हूँ। प्रश्न अब भी ज्ञानसे ज्यादा है।
भारत में मैंनेसंस्कृतियों की लड़ाईनहीं देखी। मैंने कुटुबमिनार देखी जो दुनिया की सबसे ऊँची मुसलमान इमारत है, और वह संसारके सबसे बड़े हिंदूदेश की राजदानी में उपस्थित है।
दिल्ली, जैसालमेर, देहरदून, जैयपूर, उदइपुर वाले लोग ज्ञानी और मददकर थे। अहमदाबाद के विद्यार्थी आग्राके लोगों से ज्यादा समझदार थे। इन सब शिष्यों में देश का प्रेमथा, इसलिए वे स्वाभिमानी भी थे। इधर के लोग ज्यादा शुद्ध हिंदी बोलनेवाले होने लगे थे। इन लोगोंको अच्छा लगा कि हमने हिंदीमें बातचीत की कोशिशकी।
हमने अनेक ऐतिहासिक या धार्मिक स्थानदेथे तथा ऋषिकेश कजुराहो, जुनगढ़, ओरछ, जहाँ सब लोग काफी शांत और ईमानदार थे। छात्रावास में पता नहीं क्योंस्वदेशी विद्यार्तियों से बात-चीत करनी मना था। फिर भी सिक्किम और मिज़ोरम वालोंसे मिला था। इन लोगोंकी मातृभाष हिंदी नहीं, फिर भी उन्को बहुत अच्छालगा कि हम हिंदीबोलने वाले थे।
पर सारे उत्तरप्रादेश में सब लोग हमें देखकरहमेशा सिर्फ अंग्रेज़ी पढ़नेचाहते थे। उनके भारत की संस्कृति के बारे में बहुत कम ज्ञानथा। अगरा के अध्यापकों को दुसरी भाषाओं- न स्वदेशी, न ही विदेशी – के बारे में कोई जानकारी नहीं थी।
कहते हैं कि अकेलाचना भाड़ नहीं फोड़ सकता है। पर भारत में अकेलीयात्रा करना काफी सरल है।
समुद्र के किनारे पर या पर्वतके जंगल में होटलों से दूर सोकर में भी कोई समस्या नहीं थी। किसी से डर होना नहीं पड़ा।सिक्किम में दो दोस्तों के साथ पहाड़के नीछे जाने चाहें। दोस्त के गाँव नज़दीक था। और साभी को संक्षिप्ततर की मालुम होने के कारण हमने गाड़ीवाली रास्ता नहीं पाया।कदम-कदम रखकर बहुत खेत होते हुए एक सैनिककेम्प तक आयें। उस्में रहने वाले सिपाही आसामी वाले थे। जिंकोन हिंदी न नेपाली आयी थी। मैं सोच रहा था कि क्या होगा।कुछ भी नहीं। वहाँ आर-पार जाकर घर पहूँचे।
महाराष्ट्र में कुछ समस्यहुआ, क्योंकि वहाँ रहनेवालों को कम हिंदीआती है। मैंने सोचा कि हिंदीइसलिए उतना उपयोगी नहीं।लेकिं मेरे दोस्तों में से एक लड़काजो श्रीलंक से आया था, उसने मराठीपढ़ने को शुरु की, और उसने दिखाया कि हिंदी बोलनेवालों को दुसरी भाषा सीखनाकितनी सरल है।
नेपाली भाषा समानरूप थी। यद्यपि काठमांडौ में ज्यादा लोगों को हिंदीभी आयी थी, मैंनेज्यादातर नेपाली में बात-चीत करनी की कोशिशकी।
मैंनेपता चला कि हिनदूसंस्कृति हिमालय के अत्यंत संबंधित है। मुझे सबसे दिलचस्प पहाड़ के संकृतियों का भेंट लगी। ऐसे नेपाली क्रांति के तर्क, और उसका परिणाम को पता चलना भी बहुत दिलचस्प हों। कभी-कभी नेपालकी स्थिति हंगेरी की स्थिति के सामान होने लगा है, क्योंकी यहाँ भी मुसलमानों के आक्रमण हेतु हमारीसंस्कृति पहाड़ों में सुरक्षित हुई थी। मैंनेपढ़ा, कि वहाँ के जनाजातिय की इच्छा हैः नेपाली संविधान बदलना, हिंदूवाले के बदले सम्यवादी वाला बनाकर।
इंटेर्नेट में पढ़ा कि भारत का संविधान बहुत सी विदेशी संविधानों से एकत्रित किया था। मैंनेहिंदी में नहीं पढ़ा- क्योंकी समझने की ज्ञानकाफ़ी नहिं- लेकिन मालुमहै कि भारत का धर्म मानु की स्मृति में संविधान की तरह लिखा हुआ था। धर्म विधी के ऊपर था। धर्म लोग पालन करते हैं, विधि को उतना अच्छीतरह नहिं। धर्म संविधान से प्रभावशाली है, क्योंकि युरोपवालों ने माना जाता है, कि हमने बनायेहुए चीज़ो को प्रयुक्त करके में कठिनाई होकर हमको न चीजोंको बदलना, मरम्मत करना चाहिए। पर कुछ चीजोंको अनादि होना चाहिए।
भारतिय विधि की भाषा बहुत पुरानी लगी है। जिन शब्द अंग्रेज़ी में 2-3 शब्द में प्रकटकर जाते हैं, या लेटिनभाषा से लिए हुए हैं। सो हिंदीमें संस्कृति वाले होगें।
Rene David ने लीखा था कि विधि पुराने समय में भी भारत के शासन में महत्वपूर्ण थी।
मानु की अनूदित स्मृति पढ़कर मैंनेभी देखा कि दीवानी, फ़ौजदारी और राजनितिक कानून एक साथ ही हैं, क्योंकी तब भारत में यह मानव के व्यवहार से संबंधित थी।
अंग्रेजों ने संहिताएँ प्रस्तुत कीं जिनमें कानूनकी शाखाएँ अलग-अलग –नियंत्रित हुईँ ऐसे लगता है, कि आजकल विधि (रेलवे की तरह) अंग्रेज़ी आविष्कार है।
विधि का आदेश प्रशासन का हिस्सा है, इसलिएधर्म और रीति सं अनादित नहीं हो सकता है।
योरोपमें अपराध इतना बड़ा है, क्योंकि यहाँ सब लोग कानूनके द्वारा बराबर होना मना जाते हैं। व्यक्तियाँ यहाँ भी बिल्कुल अलग-अलग हैंस लेकिंउनके संहिताओँ में लिखतेहुए कर्तव्य बहुत ही समान्रूप हैं। आजकल यहाँ पर भी छोते जगह में बहुत भीड़ रहती है, और वे लोग बहुत ही भिन्नके लोग हैं। युरोपके देशों की इच्छाएकता होती आजकल से संविधानों में सब मूल अधिकार लीखे हुए है। युरोपके संविधान में मानधिकारों में आधारित हैं। व्यक्ति अलग-अलग रहने लगते हैं। कन्वेंशन में देशों का धर्म (कर्तव्य) के बिना असंभवहै। कर्मबुमि होकर युरोपभी अहिंसा की मदद से बड़ा देश हो सकता है।
इस काम करने के लिए भारत की पुरानी विधि को पढ़नीचाहिए जिसे वैध शब्द समान्रूप होने लगते हैं।
भारत मे सब जानवरमित्रवत होते हैं। जो चिड़ियाँ थी सो सिर्फ़ ठंडे मौसम में उत्तरवाले देशों से आती हैं। विदेशों में शिकार किया जाता है, इसलिएवहाँ पुरुषों को देखकरउनको डर लगता है।
कन्वेंशन के सब देशोंके विभिन्न रितियाँ होने के होते हुए भी Convention on Conservation of Biological Diversity ( Rio De Janerio 1992) सब देशोंके लिए एक ही संधि का पाठ आबद्धकर है। मैंने इस विषय में निबंधलिखा कि हंगेरी में वन एवं जान्वरों का बचाव विधि में कैसे व्यवस्थित किया था, और इसके बारे में मैंनेएक शोध किया। इसलिएमुझे दिलचस्प है कि भारत में एक ही संधि कैसे प्रयोग किया जाता है।
युरोपमें बहुत वर्षों से जांवरो का बचाव को विधि के द्वारा नींव रखी जाती है। भारत में इसको धर्म से किया जाने लगता है। Phd के लिए इस विषय में हिंदीऔर नेपाली में भी शोधकार्य करना चाहेगा। धुरभाग्य से उत्तर प्रदेश में होकर बहुत कठिनाईयाँ होती थीं। इसलिएहिंदी भाषा मैंने सिर्फथोड़ी पढ़ी।
संस्थान के गुरुजी काफी संतोषी थे, लेकिं अपने मातृभाषा विदेशी छात्रों को पढ़ाईमें प्रणाली बहुत कम थीं। अंत में बहुत पाठ नहीं मनायेहुए।
फिर भी यह पढ़ाईबहुत उपयोगी थी, क्योंकी मेरी Phd शोधकार्य विधिक प्रतिरोपण से संबंधित है।
मैंनेविश्विद्यालय में दो बार प्रस्तुति की, और अनेक परिसंवादों में इस विषय के बारे में भाषण की।
मैंनेभारत और नेपाल में एक अलग संस्कृति, और युरोप का सबसे पुराना इतिहास देखा।
इसलिएमें सब लोगों को आभारीहूँ, बहुत धन्यवाद।
सादर प्रणाम,
01.02.2009 डॉ. चनाद अंतल
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